Friday, October 26, 2007

ब्लोगर तकनिकी के बाते मे ज्यादा जानकारी चाहते है

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क्या आप ब्लोग हेकिग,टिप्स,ट्रिक्स के बारे जानना चाहते है तो मे अपने साथियो के साथ हेकिग,टिप्स,ट्रिक्स कि कुछ जानकारी शेयर करना चाहता हु - मुकेश कुमार

Friday, October 26, 2007

दो प्रजातियों में बंट जाएगा इंसान

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विशेषज्ञों ने वर्ष 1900 में 20वीं सदी के लिए कुछ भविष्यवाणी की थी। उनमें से अधिकतर गलत लेकिन कुछ सही भी साबित हुई हैं। इन्हीं सही हुई भविष्यवाणियों में इंटरनेट और परमाणु बम विकसित होने की बात भी शामिल थी। यदि 1900 में की गई भविष्यवाणियों को एक पथ प्रदर्शक के तौर पर लें तो ब्रिटेन में अनुसंधानकर्ता इस बार भी सही साबित हो सकता है। उन्होंने भविष्यवाणी की है कि मानव जाति 1,00,000 साल के समय में दो अलग अलग प्रजातियों में विभक्त हो जाएगी। इनमें से एक आकर्षक, बुद्धिमान, सत्तारूढ़, संभ्रांत वर्ग, दूसरी दबी कुचली पिछड़ी और कुरूप किस्म की होगी। वर्ष 3000 में मानव जाति अपने भौतिक रूप के चरमोत्कर्ष पर होगी। लोग अपने यौन साथी के बारे में बेहद चयनित रूख अपनाएंगे जिससे मानवता उप प्रजातियों में बंट जाएगी। उच्च वर्ग के वंशज निम्न श्रेणी के मानवों के मुकाबले आनुवांशिक रूप से लंबे छरहरे स्वस्थ और आकर्षक होंगे। लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स के प्रमुख शोधकर्ता आ॓लिवर करी के अनुसार निकट भविष्य में यानी अगले एक हजार साल में इंसान छह से सात फुट की लंबाई के होंगे। उनकी जीवन संभावना 120 साल तक हो जाएगी। सोजन्य - राष्ट्रीय सहारा

Friday, October 26, 2007

लखनऊ के जियॉलजिस्ट की खोज से दुनिया दंग

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भूगर्भशास्त्री प्रो. एस. बी. मिश्रा को इस बात का गर्व है कि लंबे अरसे बाद भारत के किसी जियॉलजिस्ट की खोज को दुनिया ने आखिर स्वीकारा। प्रोफेसर मिश्रा ने जून 1960 में कनाडा के न्यू फाउंडलैंड स्थित मिस्टेकन पॉइंट में करीब साढ़े छप्पन करोड़ साल पुराने जीवाश्म की खोज की थी। अब उस फॉसिल का नाम खुद उनके नाम पर 'फ्रैक्टोफूसस मिश्राई' रखा गया है। प्रोफेसर कहते हैं कि मैंने इसकी कल्पना तक नहीं की थी कि उस जीवाश्म का नाम मुझ पर रखा जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ तो सबसे ज्यादा खुशी यहां और देशभर में रहने वाले पुराने विज्ञानी दोस्तों और परिजनों को हुई। मिश्रा इस खोज को यूनेस्को विश्व विरासत स्थल में शामिल करवाने में जुट गए हैं। लखनऊ के 'बख्शी का तालाब' स्थित गांव कुनुरा के मामूली परिवार में जन्मे प्रोफेसर कहते हैं कि मैं समाज के लिए अभी और बहुत कुछ करना चाहता हूं। कनाडा में शानदार करियर को छोड़कर भारत आने और एक स्कूल चलाने की इच्छा ने उन्हें लखनऊ पहुंचा दिया। प्रोफेसर दिलचस्पी रखने वाले बच्चों को साइंस की नई विधाएं सिखाते हैं। वह कहते हैं कि मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं साइंस ग्रैजुएट हो सकूंगा। इंटरमीडिएट की पढ़ाई से पहले ही मुझे लगने लगा था कि मैं शायद ही कभी इंटर के एग्जाम दे पाऊंगा। मगर इम्तिहान में अच्छे मार्क्स आने की वजह से वजीफा मिलने लगा और मैंने लखनऊ में ग्रैजुएशन और पीजी किया। फिर पीएचडी के लिए कनाडा गया। इंडिया में अकाल की तस्वीरों को देख मन दवित हो उठा और मैंने लौटने का मन बनाया। कनाडा से लौटने के बाद उन्होंने कुमायूं यूनिवर्सिटी के छात्रों को भी वक्त दिया। इस दौरान उन्होंने नैनीताल और उसके करीब के इलाके में भी खोज जारी रखी। वह कहते हैं कि जियॉलजी में अभी काफी रिसर्च की गुंजाइश है। प्रो. मिश्रा कहते हैं कि दुनिया में लखनऊ से बेहतर कोई शहर नहीं। दिल्ली-मुंबई जाने पर लगता है कि किसी पराये शहर में आ गए हैं। राजनीतिज्ञों के काम से प्रोफेसर कुछ खास खुश नहीं हैं। धरती पर बहुकोषीय जीवन के सबसे पुराने रेकॉर्ड की खोज करने वाले प्रोफेसर मिश्र कनाडा के पुर्तगाल कोव साउथ सिटी को आज तक नहीं भूले। अपनी खोज की विशेषता में वह कहते हैं कि वह सिंगल सेल और मल्टी सेल के बीच की अहम कड़ी है। वह संरचना और लक्षण के हिसाब से वनस्पति की तुलना में जंतु के ज्यादा करीब है। भविष्य में इस जीवाश्म से कई और बातों का पता लगना है। प्रोफेसर कहते हैं कि ऑस्ट्रेलिया के जिम गेहलिंग और कनाडा के गाई नारबॉन (दोनों भूगर्भ विज्ञानी) के ईमेल से पता चला कि कनाडा सरकार ने मिस्टेकन पॉइंट को संरक्षित घोषित कर वहां की चट्टानों और जीवाश्मों के साथ छेड़छाड़ करने को अपराध की कैटगरी में रखा है। मैंने इसके लिए कनाडा सरकार का आभार जताया। प्रोफेसर यहां के गोमतीनगर स्थित 'अवध अपार्टमेंट' में रह रहे हैं। बुजुर्ग होने के बावजूद भी वह पूरी तरह सक्रिय हैं और उन्हें उम्मीद है कि इंडिया के भूगर्भ विज्ञानी भी अपनी मेहनत के दम पर देश का नाम रोशन करेंगे।

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